धान की फसल को कीड़ों (कीटों) से बचाना हर किसान के लिए एक बड़ी चुनौती होती है। अगर समय रहते इन कीटों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो ये पूरी फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इस ब्लॉग में, हम धान में लगने वाले प्रमुख कीटों और उनसे बचाव के प्राकृतिक एवं रासायनिक तरीकों के बारे में जानेंगे।

धान में लगने वाले प्रमुख कीट
- तना छेदक (Stem Borer)
लक्षण: पौधों की पत्तियाँ सूख जाती हैं, तने के अंदर सुरंग दिखाई देती है।
नुकसान: पौधा मुरझाकर मर जाता है, उपज कम हो जाती है। - गंधी बग (Leafhopper)
लक्षण: पत्तियों का रंग पीला पड़ना, पौधे की वृद्धि रुक जाना।
नुकसान: यह वायरस फैलाता है, जिससे “टुंगरो” रोग हो सकता है। - हिस्पा बीटल (Hisp Beetle)
लक्षण: पत्तियों पर सफेद धारियाँ दिखाई देना।
नुकसान: पत्तियाँ सूखकर गिर जाती हैं, प्रकाश संश्लेषण प्रभावित होता है। - ब्राउन प्लांट हॉपर (Brown Plant Hopper – BPH)
लक्षण: पौधों के निचले हिस्से में काले कीट दिखाई देना, पत्तियाँ मुड़ जाना।
नुकसान: पूरा पौधा सूख सकता है, “हॉपरबर्न” की समस्या होती है।
धान के कीटों को नियंत्रित करने के उपाय
- प्राकृतिक/जैविक तरीके (Organic Methods) नीम का तेल या नीम की खली
- नीम कीटनाशक गुणों से भरपूर है।
उपयोग: – 5 मिलीलीटर नीम का तेल + 1 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। नीम की खली को खेत में डालने से भी कीटों से बचाव होता है। गौमूत्र + तम्बाकू का घोल
बनाने की विधि: - 10 लीटर गौमूत्र + 100 ग्राम तम्बाकू पाउडर को 24 घंटे भिगोकर रखें। छानकर 50 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। फेरोमोन ट्रैप (Pheromone Traps)
- तना छेदक जैसे कीटों को आकर्षित करने के लिए फेरोमोन ट्रैप लगाएं।
- प्रति एकड़ 8-10 ट्रैप लगाने से कीटों की संख्या कम हो जाती है।
- रासायनिक कीटनाशक (Chemical Pesticides)
अगर कीटों का प्रकोप ज्यादा हो, तो निम्न रासायनिक दवाओं का उपयोग करें:

सावधानी:
- रासायनिक दवाओं का उपयोग सही मात्रा में ही करें।
- छिड़काव शाम के समय करें ताकि मधुमक्खियों को नुकसान न हो।
- सांस्कृतिक नियंत्रण (Cultural Control)
- समय पर बुवाई करें – जल्दी या देर से बोने पर कीटों का प्रकोप बढ़ सकता है।
-खेत को साफ रखें – खरपतवार कीटों को आकर्षित करते हैं। - फसल चक्र (Crop Rotation) – धान के बाद दलहनी फसलें उगाने से कीटों की संख्या कम होती है।
निष्कर्ष
धान की फसल को कीटों से बचाने के लिए जैविक तरीकों को प्राथमिकता दें, लेकिन अगर समस्या गंभीर हो, तो रासायनिक दवाओं का सही मात्रा में उपयोग करें। फेरोमोन ट्रैप, नीम का तेल और गौमूत्र के घोल जैसे प्राकृतिक उपाय न केवल सुरक्षित हैं, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी हैं।
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